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	<title>सुप्रीम कोर्ट &#8211; TIMES OF CRIME</title>
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	<description>‘‘टाइम्स ऑफ क्राइम’’ (अपराध जगत का लेखा-जोखा )</description>
	<lastBuildDate>Thu, 21 May 2026 11:52:37 +0000</lastBuildDate>
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		<title>मध्य प्रदेश में लोकायुक्त संगठन को आरटीआई से छूट दिए जाने पर सुप्रीम कोर्ट ने उठाए गंभीर सवाल और जताई नाराजगी</title>
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		<dc:creator><![CDATA[TIMES OF CRIME]]></dc:creator>
		<pubDate>Thu, 21 May 2026 11:52:37 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[RTI ( सूचना का अधिकार )]]></category>
		<category><![CDATA[मध्य प्रदेश]]></category>
		<category><![CDATA[राष्ट्रीय]]></category>
		<category><![CDATA[24 घंटे के भीतर]]></category>
		<category><![CDATA[rti]]></category>
		<category><![CDATA[आरटीआई अधिनियम की धारा 24(4)]]></category>
		<category><![CDATA[खुफिया और सुरक्षा संगठनों]]></category>
		<category><![CDATA[मध्य प्रदेश लोकायुक्त संगठन]]></category>
		<category><![CDATA[लोकायुक्त संगठन]]></category>
		<category><![CDATA[सुप्रीम कोर्ट]]></category>
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					<description><![CDATA[MP हाईकोर्ट ने हाल में लोकायुक्त पुलिस को हर एफआईआर (FIR) को 24 घंटे के भीतर अपनी वेबसाइट पर सार्वजनिक करने का भी आदेश दिया था सुप्रीम कोर्ट ने मध्य प्रदेश लोकायुक्त के विशेष पुलिस स्थापना (Special Police Establishment &#8211; SPE) को सूचना के अधिकार (RTI) अधिनियम से छूट देने के मामले में राज्य सरकार...]]></description>
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<p class="has-text-align-center"><strong>MP हाईकोर्ट ने हाल में लोकायुक्त पुलिस को हर एफआईआर (FIR) को 24 घंटे के भीतर अपनी वेबसाइट पर सार्वजनिक करने का भी आदेश दिया था</strong></p>



<p>सुप्रीम कोर्ट ने मध्य प्रदेश लोकायुक्त के विशेष पुलिस स्थापना (Special Police Establishment &#8211; SPE) को सूचना के अधिकार (RTI) अधिनियम से छूट देने के मामले में राज्य सरकार पर बेहद तीखी और कड़ी टिप्पणी की है।</p>



<p>​जस्टिस जे.के. माहेश्वरी और जस्टिस अतुल एस. चांदुरकर की पीठ ने सुनवाई के दौरान मप्र सरकार की खिंचाई करते हुए न केवल लोकायुक्त को मिली इस छूट की वैधता पर सवाल उठाए, बल्कि सरकारी वकीलों के कोर्ट में रवैये को लेकर भी भारी नाराजगी जाहिर की।</p>



<h2 class="wp-block-heading">​​सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई के दौरान ये महत्वपूर्ण आपत्तियां दर्ज की &#8211;</h2>



<h3 class="wp-block-heading">​1. &#8220;लोकायुक्त कोई खुफिया या सुरक्षा संगठन है क्या?&#8221;</h3>



<p>​कोर्ट ने मप्र सरकार द्वारा वर्ष 2011 में जारी की गई उस अधिसूचना (Notification) पर गंभीर सवाल उठाया, जिसके तहत लोकायुक्त की विशेष पुलिस स्थापना (SPE) को आरटीआई के दायरे से बाहर कर दिया गया था।</p>



<p>​कानूनी पहलू : आरटीआई अधिनियम की धारा 24(4) के तहत राज्य सरकारें केवल &#8216;खुफिया और सुरक्षा संगठनों&#8217; (Intelligence and Security Organisations) को ही आरटीआई से छूट दे सकती हैं।</p>



<p>​कोर्ट ने साफ तौर पर पूछा कि सरकार यह साबित करे कि लोकायुक्त संगठन किस तरह से एक खुफिया या सुरक्षा संगठन की श्रेणी में आता है? कोर्ट ने कहा कि रिकॉर्ड पर ऐसा कुछ भी नहीं लाया गया है जिससे यह साबित हो। इसके अभाव में, 2011 की यह अधिसूचना आरटीआई अधिनियम की मूल भावना के विपरीत है और इसे &#8220;कानूनी मंजूरी (Sanction of law)&#8221; प्राप्त नहीं माना जा सकता।</p>



<h3 class="wp-block-heading">​2. संतोषजनक जवाब न मिलने पर अधिसूचना रद्द करने की चेतावनी :</h3>



<p>​सुप्रीम कोर्ट ने मप्र के मुख्य सचिव (Chief Secretary) और महाधिवक्ता (Advocate General) को इस मामले में औपचारिक नोटिस जारी किया है।</p>



<p>कोर्ट ने स्पष्ट चेतावनी दी है कि यदि अगली सुनवाई पर राज्य सरकार की ओर से इस बात का संतोषजनक जवाब नहीं मिला कि लोकायुक्त को किस आधार पर छूट दी गई, तो कोर्ट 2011 की उस अधिसूचना को पूरी तरह से निरस्त (Quash) कर सकता है।</p>



<h3 class="wp-block-heading">​3. सरकारी वकीलों की लापरवाही पर भारी नाराजगी:</h3>



<p>​मामले की सुनवाई के दौरान कोर्ट ने म प्र सरकार का पक्ष रखने वाले पैनल के वकीलों के लापरवाह रवैये पर भी गंभीर टिप्पणी की।</p>



<p>​कोर्ट ने पाया कि जब मामला पुकारा गया, तो प्रदेश सरकार की ओर से कोई वकील मौजूद नहीं था।</p>



<p>​दोबारा बुलाए जाने पर जब एक काउंसिल उपस्थित हुए, तो उन्होंने मामले के तथ्यों को लेकर पूरी तरह अनभिज्ञता (Ignorance) जाहिर की।</p>



<p>​कोर्ट ने कहा : &#8220;यह हर दिन की बात हो गई है कि जब भी प्रदेश सरकार के मामले सूचीबद्ध होते हैं, वकील अदालत में मौजूद नहीं रहते। बुलाने पर वे आते हैं और केस की जानकारी होने से इंकार कर देते हैं।</p>



<p>सरकारी पैनल के वकीलों का ऐसा प्रयास बिल्कुल भी स्वीकार्य नहीं है।&#8221;</p>



<p>​कोर्ट ने इस संबंध में राज्य के लॉ सेक्रेटरी और मुख्य सचिव को वकीलों के इस पैनल की उपयोगिता और निरंतरता की समीक्षा करने के निर्देश दिए हैं।</p>



<h3 class="wp-block-heading">​मामले की पृष्ठभूमि :</h3>



<p>यह पूरा विवाद मप्र हाईकोर्ट के उस आदेश के बाद सुप्रीम कोर्ट पहुंचा, जिसमें हाईकोर्ट ने लोकायुक्त को 30 दिनों के भीतर आरटीआई के तहत मांगी गई जानकारी देने और आदेश का पालन न करने पर ₹5,000 का जुर्माना भरने का निर्देश दिया था।</p>



<p>राज्य सरकार ने अपनी 2011 की अधिसूचना का हवाला देकर इस आदेश को चुनौती दी थी, जो अब सुप्रीम कोर्ट के कड़े रुख के बाद खुद ही कानूनी संकट में घिर गई है।</p>



<p>​* MP हाईकोर्ट ने हाल में लोकायुक्त पुलिस को हर एफआईआर (FIR) को 24 घंटे के भीतर अपनी वेबसाइट पर सार्वजनिक करने का भी आदेश दिया था,</p>



<p>जो इस संस्थान की कार्य प्रणाली में पारदर्शिता की मांग को और रेखांकित करता है।</p>
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		<title>लोक सेवकों के विरुद्ध शिकायत के लिए (BNSS) की धारा 175(4) के तहत शपथ पत्र अनिवार्य : सुप्रीम कोर्ट</title>
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		<dc:creator><![CDATA[TIMES OF CRIME]]></dc:creator>
		<pubDate>Thu, 29 Jan 2026 15:41:16 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[क्राइम / अपराध]]></category>
		<category><![CDATA[राष्ट्रीय]]></category>
		<category><![CDATA[(BNSS) की धारा 175(4)]]></category>
		<category><![CDATA[9893221036]]></category>
		<category><![CDATA[Priyanka Srivastava Vs. State of U.P. (2015)]]></category>
		<category><![CDATA[times of crime]]></category>
		<category><![CDATA[जस्टिस दीपांकर दत्ता]]></category>
		<category><![CDATA[जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस मनमोहन]]></category>
		<category><![CDATA[जस्टिस मनमोहन]]></category>
		<category><![CDATA[पुलिस अधीक्षक (Superintendent of Police)]]></category>
		<category><![CDATA[लोक सेवकों]]></category>
		<category><![CDATA[सुप्रीम कोर्ट]]></category>
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					<description><![CDATA[सभी जिले एवं तहसीलों में ब्यूरो संवाददाताओं की आवश्यकता है हमसे जुड़ने के लिए संपर्क करें : 9893221036 सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 175(4) के तहत किसी लोक सेवक (public servant) के विरुद्ध मजिस्ट्रेट के समक्ष शिकायत तभी प्रस्तुत की जा सकती है, जब शिकायतकर्ता पहले...]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[
<p><strong><br>सभी जिले एवं तहसीलों में ब्यूरो संवाददाताओं की आवश्यकता है हमसे जुड़ने के लिए संपर्क करें : 9893221036</strong></p>



<p>सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 175(4) के तहत किसी लोक सेवक (public servant) के विरुद्ध मजिस्ट्रेट के समक्ष शिकायत तभी प्रस्तुत की जा सकती है, जब शिकायतकर्ता पहले धारा 175(3) का अनुपालन करे।</p>



<p>अर्थात्, शिकायतकर्ता को यह दिखाना अनिवार्य है कि उसने पहले पुलिस अधीक्षक (Superintendent of Police) के समक्ष शपथ-पत्र (affidavit) सहित लिखित शिकायत दी थी।</p>



<p>यह निर्णय जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस मनमोहन की खंडपीठ ने दिया। खंडपीठ के समक्ष यह प्रश्न था कि क्या धारा 175(4) एक स्वतंत्र प्रावधान है, जिसके तहत मजिस्ट्रेट मौखिक शिकायत पर भी कार्रवाई कर सकता है, या फिर यह धारा 175(3) का ही एक प्रक्रियात्मक विस्तार है, जिसमें Priyanka Srivastava Vs. State of U.P. (2015) में निर्धारित सुरक्षा उपाय लागू होंगे।</p>



<h3 class="wp-block-heading">धारा 175(3) और 175(4) का संबंध</h3>



<p>सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि धारा 175(4) कोई स्वतंत्र या अलग-थलग प्रावधान नहीं है, बल्कि इसे धारा 175(3) के साथ सामंजस्यपूर्ण ढंग से पढ़ा जाना चाहिए। इसका अर्थ यह है कि:</p>



<p>किसी लोक सेवक के विरुद्ध मजिस्ट्रेट के समक्ष सीधे शिकायत दाखिल कर जांच का आदेश नहीं मांगा जा सकता,</p>



<p>जब तक कि शिकायतकर्ता यह न दिखाए कि उसने पहले धारा 173(4) BNSS के तहत पुलिस अधीक्षक से संपर्क किया था और उसके बाद मजिस्ट्रेट के समक्ष शपथ-पत्र सहित आवेदन प्रस्तुत किया गया हो।</p>



<h3 class="wp-block-heading">अदालत ने कहा:</h3>



<p>“पुलिस अधीक्षक के समक्ष उपलब्ध उपाय का सहारा लेना, न्यायिक मजिस्ट्रेट के अधिकार क्षेत्र को सक्रिय करने के लिए एक अनिवार्य पूर्व-शर्त है।”</p>



<h3 class="wp-block-heading">प्रक्रिया को दरकिनार करने की अनुमति नहीं</h3>



<p>अदालत ने चेतावनी दी कि यदि धारा 175(4) को एक स्वतंत्र प्रावधान मान लिया जाए, तो इससे शिकायतकर्ता कानून द्वारा स्थापित क्रमबद्ध प्रक्रिया (statutory hierarchy) को दरकिनार कर सकेगा।</p>



<p>ऐसी स्थिति में कोई व्यक्ति बिना शपथ-पत्र और बिना पहले पुलिस अधीक्षक से संपर्क किए, सीधे मजिस्ट्रेट के समक्ष लोक सेवक के विरुद्ध शिकायत कर सकेगा, जो कि विधायी मंशा के विपरीत होगा।</p>



<p>अदालत ने कहा कि ऐसा करने से असंगत और अवांछित परिणाम उत्पन्न होंगे, क्योंकि धारा 175(3) स्पष्ट रूप से धारा 173(4) के तहत किए गए प्रयास और शपथ-पत्र की मांग करती है, जबकि धारा 175(4) को अलग-थलग पढ़ने से यह सुरक्षा समाप्त हो जाएगी।</p>



<h2 class="wp-block-heading">अदालत के निष्कर्ष:</h2>



<h3 class="wp-block-heading">सुप्रीम कोर्ट ने अपने निष्कर्ष इस प्रकार संक्षेपित किए:</h3>



<p>धारा 175(3) और 175(4) को अलग-अलग नहीं, बल्कि एक साथ पढ़ा जाना चाहिए; धारा 175(4), धारा 175(3) का ही विस्तार है।</p>



<p>जांच का आदेश देने की शक्ति मुख्य रूप से धारा 175(3) के तहत मजिस्ट्रेट को प्राप्त होती है। धारा 175(4) भी यह शक्ति देती है, लेकिन लोक सेवकों से जुड़े मामलों में एक विशेष प्रक्रिया निर्धारित करती है।</p>



<p>धारा 175(4) में प्रयुक्त शब्द “शिकायत (complaint)” का अर्थ मौखिक शिकायत नहीं है। इसे उसी प्रकार के आवेदन के रूप में समझा जाएगा, जैसा धारा 175(3) में है—अर्थात् शपथ-पत्र से समर्थित लिखित आवेदन, जिसमें संज्ञेय अपराध के आरोप हों।</p>



<h2 class="wp-block-heading">निष्कर्ष</h2>



<p>अदालत ने दो टूक कहा कि लोक सेवकों के विरुद्ध शिकायतों में वैधानिक सुरक्षा उपायों का पालन अनिवार्य है, और कोई भी शिकायतकर्ता निर्धारित प्रक्रिया को छोड़कर सीधे मजिस्ट्रेट के पास नहीं जा सकता।</p>



<p>सभी जिले एवं तहसीलों में ब्यूरो संवाददाताओं की आवश्यकता है हमसे जुड़ने के लिए संपर्क करें : 9893221036</p>
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		<item>
		<title>सुप्रीम कोर्ट का महत्वपूर्ण निर्णय: बिना कोर्ट की अनुमति के नए FIR में गिरफ्तारी पर रोक</title>
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		<dc:creator><![CDATA[TIMES OF CRIME]]></dc:creator>
		<pubDate>Thu, 23 Oct 2025 16:46:26 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[राष्ट्रीय]]></category>
		<category><![CDATA[2025]]></category>
		<category><![CDATA[नए FIR में गिरफ्तारी पर रोक]]></category>
		<category><![CDATA[मुख्य न्यायाधीश और जस्टिस के. विनोद चंद्रन]]></category>
		<category><![CDATA[सुप्रीम कोर्ट]]></category>
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					<description><![CDATA[सुप्रीम कोर्ट ने उत्तर प्रदेश पुलिस को बिना कोर्ट की अनुमति के नए FIR में गिरफ्तारी करने से रोक दिया है। यह आदेश उन मामलों में लागू होगा जहां आरोपियों ने दावा किया है कि उनके खिलाफ बार-बार FIR दर्ज की जा रही है ताकि उनकी जमानत रद्द की जा सके। आरोपियों ने आरोप लगाया...]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[
<p>सुप्रीम कोर्ट ने उत्तर प्रदेश पुलिस को बिना कोर्ट की अनुमति के नए FIR में गिरफ्तारी करने से रोक दिया है। यह आदेश उन मामलों में लागू होगा जहां आरोपियों ने दावा किया है कि उनके खिलाफ बार-बार FIR दर्ज की जा रही है ताकि उनकी जमानत रद्द की जा सके। आरोपियों ने आरोप लगाया था कि पुलिस द्वारा उनके खिलाफ कई FIR दर्ज की जा रही हैं जिससे उनकी जमानत को कमजोर किया जा सके।</p>



<p class="has-vivid-purple-color has-text-color has-link-color has-medium-font-size wp-elements-2a41ef5cf13972d855627d507e5cb536"><strong>निर्णय की मुख्य बातें:</strong></p>



<p><strong>&#8211; कोर्ट की अनुमति अनिवार्य: </strong></p>



<p>कोर्ट ने निर्देश दिया है कि आरोपियों को भविष्य में दर्ज होने वाले किसी भी नए FIR में बिना कोर्ट की अनुमति के गिरफ्तार नहीं किया जाएगा।</p>



<p><strong>&#8211; जमानत और गिरफ्तारी:</strong></p>



<p>कोर्ट ने आरोपियों को FIR नंबर 141/2025 में जमानत दी है और निर्देश दिया है कि भविष्य में दर्ज होने वाले किसी भी नए FIR में बिना कोर्ट की अनुमति के गिरफ्तारी नहीं की जाएगी।</p>



<p class="has-vivid-purple-color has-text-color has-link-color wp-elements-324e560f6597a3199ad1dac19704f696"><strong>केस विवरण:</strong></p>



<p><strong>&#8211; केस का नाम:</strong>  Wazid &amp; Ors. vs State of Uttar Pradesh &amp; Ors.<br><strong>&#8211; केस नंबर:</strong> W.P. (Crl.) No. 450/2024<br><strong>&#8211; कोर्ट: </strong>सुप्रीम कोर्ट ऑफ इंडिया<br><strong>&#8211; न्यायाधीश:</strong> मुख्य न्यायाधीश और जस्टिस के. विनोद चंद्रन<br><strong>&#8211; आदेश</strong> की तारीख: 22-08-2025</p>



<p>इस निर्णय से यह सुनिश्चित होगा कि पुलिस अपनी शक्तियों का दुरुपयोग न करे और आरोपियों के अधिकारों की रक्षा हो.¹</p>
]]></content:encoded>
					
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		<title>सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला, पत्रकारों पर मुकदमा दर्ज करना अब आसान नहीं</title>
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		<dc:creator><![CDATA[TIMES OF CRIME]]></dc:creator>
		<pubDate>Fri, 10 Oct 2025 17:22:14 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[मीडिया हलचल]]></category>
		<category><![CDATA[राष्ट्रीय]]></category>
		<category><![CDATA[अनुच्छेद 19(1)]]></category>
		<category><![CDATA[पत्रकार]]></category>
		<category><![CDATA[पत्रकारों पर मुकदमा]]></category>
		<category><![CDATA[सुप्रीम कोर्ट]]></category>
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					<description><![CDATA[दिल्ली:&#160;सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि सरकार की आलोचना करने वाले पत्रकारों के खिलाफ मुकदमा दर्ज नहीं किया जाना चाहिए। यह फैसला पत्रकार अभिषेक उपाध्याय की गिरफ्तारी पर रोक लगाते हुए दिया गया है। यह भी पढ़ें: जबलपुर के खेल अधिकारी एवं लोक सूचना अधिकारी आशीष पांडे के खिलाफ 25000 का जुर्माना...]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[
<h1 class="wp-block-heading"></h1>



<p><strong>दिल्ली:</strong>&nbsp;सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि सरकार की आलोचना करने वाले पत्रकारों के खिलाफ मुकदमा दर्ज नहीं किया जाना चाहिए। यह फैसला पत्रकार अभिषेक उपाध्याय की गिरफ्तारी पर रोक लगाते हुए दिया गया है।</p>



<figure class="wp-block-image"><a href="https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEj2O-AzSllrrUwe84fTbvnzlMi4_bwIWS6Yni9vDab2-_WEXOiYbanRUO-AtXH9aGWa2qRxCiwWtff1iqE5LOpye21UYBfwsh5KbWa7FBYDWs1tQD8drTVtCjb54mDkQ49shIrvQ8HlrexlQh6oqS9kvI002YZXTZno0aO9YvXVY-2jNQejDpQBSRCPCks/s1280/high%20court.jpeg"><img decoding="async" src="https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEj2O-AzSllrrUwe84fTbvnzlMi4_bwIWS6Yni9vDab2-_WEXOiYbanRUO-AtXH9aGWa2qRxCiwWtff1iqE5LOpye21UYBfwsh5KbWa7FBYDWs1tQD8drTVtCjb54mDkQ49shIrvQ8HlrexlQh6oqS9kvI002YZXTZno0aO9YvXVY-2jNQejDpQBSRCPCks/s16000/high%20court.jpeg" alt=""/></a></figure>



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<p><strong>क्या है पूरा मामला</strong></p>



<p>पत्रकार अभिषेक उपाध्याय के खिलाफ यूपी पुलिस ने मुकदमा दर्ज किया था, जिस पर सुप्रीम कोर्ट ने रोक लगा दी है। कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि पत्रकार को उसके विचार अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता संविधान के अनुच्छेद 19(1) से सुरक्षित है।</p>



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<p><strong>सुप्रीम कोर्ट का आदेश</strong></p>



<p>सरकार की आलोचना के लिए किसी पत्रकार के खिलाफ मुकदमा दर्ज नहीं होना चाहिए।– पत्रकारों को उनके विचार व्यक्त करने की स्वतंत्रता प्राप्त है।– लोकतंत्र में मीडिया की स्वतंत्रता आवश्यक है, और सरकार की आलोचना को अपराध नहीं माना जा सकता।</p>



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<p><strong>पत्रकारों के लिए राहत</strong></p>



<p>सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले को पत्रकारों की स्वतंत्रता के लिए एक बड़ी जीत माना जा रहा है। यह आदेश सरकार की आलोचना करने वाले पत्रकारों के खिलाफ दायर मुकदमों पर रोक लगाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।</p>
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		<title>पत्रकारों के लेख और वीडियो प्रथम दृष्यता राजद्रोह नहीं : सुप्रीम कोर्ट</title>
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		<dc:creator><![CDATA[TIMES OF CRIME]]></dc:creator>
		<pubDate>Thu, 14 Aug 2025 18:46:13 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[मीडिया हलचल]]></category>
		<category><![CDATA[राष्ट्रीय]]></category>
		<category><![CDATA[जस्टिस जॉयमाल्या बागची]]></category>
		<category><![CDATA[जस्टिस सूर्यकांत]]></category>
		<category><![CDATA[धारा 152]]></category>
		<category><![CDATA[पत्रकारों]]></category>
		<category><![CDATA[पत्रकारों के लेख]]></category>
		<category><![CDATA[राजद्रोह]]></category>
		<category><![CDATA[सुप्रीम कोर्ट]]></category>
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					<description><![CDATA[सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि पत्रकार का आर्टिकल या वीडियो अपने आप में राष्ट्रीय एकता और अखंडता के लिए खतरा नहीं, BNS की धारा 152 के तहत कार्रवाई का आधार नहीं बनता। नई दिल्ली:&#160;सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को कहा कि किसी पत्रकार का समाचार लेख या वीडियो अपने आप में देश की एकता और अखंडता...]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[
<p><em><strong>सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि पत्रकार का आर्टिकल या वीडियो अपने आप में राष्ट्रीय एकता और अखंडता के लिए खतरा नहीं, BNS की धारा 152 के तहत कार्रवाई का आधार नहीं बनता।</strong></em></p>



<p><strong>नई दिल्ली:</strong>&nbsp;सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को कहा कि किसी पत्रकार का समाचार लेख या वीडियो अपने आप में देश की एकता और अखंडता को ख़तरे में डालने का कार्य नहीं माना जा सकता। इसलिए, ऐसे मामलों में भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 152 के तहत कार्रवाई का आधार नहीं बनता। यह धारा, भारतीय दंड संहिता (IPC) की पुरानी ‘देशद्रोह’ संबंधी धारा 124A का संशोधित रूप है।</p>



<p class="has-text-align-center has-white-color has-vivid-purple-background-color has-text-color has-background has-link-color has-medium-font-size wp-elements-e5fffc48eaf9c69a9324514c5e409b87"><strong>सुप्रीम कोर्ट : पत्रकार का आर्टिकल या वीडियो, राष्ट्रीय एकता के लिए खतरा नहीं –                           BNS की धारा 152 के तहत कार्रवाई उचित नहीं</strong></p>



<p>जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की पीठ ने यह टिप्पणी&nbsp;<em>The Wire</em>&nbsp;के संपादक सिद्धार्थ वरदराजन और&nbsp;<em>फाउंडेशन ऑफ इंडिपेंडेंट जर्नलिज़्म</em>&nbsp;के सदस्यों को गिरफ्तारी से राहत देते हुए की। असम पुलिस ने उनके खिलाफ एक शिकायत के आधार पर FIR दर्ज की थी, जिसमें आरोप लगाया गया था कि वरदराजन ने ‘ऑपरेशन सिंदूर’ के दौरान भारतीय वायुसेना के विमानों के कथित नुकसान पर “उत्तेजक” और “देशद्रोही” लेख प्रकाशित किए। पत्रकार का कहना है कि उनकी रिपोर्ट भारत के रक्षा कर्मियों, जिनमें इंडोनेशिया में तैनात भारतीय सैन्य अटैच भी शामिल हैं, के बयानों पर आधारित थी।</p>



<h3 class="wp-block-heading"><strong>&#8220;क्या पत्रकारों को सिर्फ आर्टिकल लिखने पर गिरफ्तार किया जाए?&#8221;</strong></h3>



<p>सुनवाई के दौरान जस्टिस सूर्यकांत ने सवाल किया,&nbsp;<em>&#8220;सिर्फ आर्टिकल लिखने या न्यूज़ वीडियो बनाने पर क्या पत्रकारों को मामलों में फंसाना चाहिए? क्या इसके लिए गिरफ्तारी होनी चाहिए?&#8221;</em></p>



<p>अटॉर्नी जनरल तुषार मेहता ने राज्य की ओर से दलील दी कि धारा 152 की वैधता को चुनौती देने वाली याचिका, “जवाबदेही से बचने का बहाना” है।</p>



<p>जस्टिस सूर्यकांत ने स्पष्ट किया,&nbsp;<em>&#8220;हम पत्रकारों को किसी अलग वर्ग के रूप में नहीं देख रहे हैं, लेकिन क्या कोई आर्टिकल सचमुच देश की एकता और अखंडता के लिए तात्कालिक ख़तरा पैदा करता है? यह तो अवैध हथियार या गोला-बारूद की तस्करी जैसा मामला नहीं है।&#8221;</em></p>



<h3 class="wp-block-heading"><strong>धारा 152 के तहत &#8216;खतरे&#8217; की परिभाषा संभव नहीं: SC</strong></h3>



<p>धारा 152 को अस्पष्ट बताने पर जस्टिस सूर्यकांत ने कहा,&nbsp;<em>&#8220;विधानमंडल कैसे यह तय कर सकता है कि कौन से सभी कृत्य राष्ट्रीय एकता और अखंडता को ख़तरे में डालेंगे? कानून को हर मामले के तथ्यों के आधार पर लागू करना होगा। अगर इसे विस्तार से परिभाषित करने की मांग की जाएगी, तो यह खुद एक ख़तरा बन जाएगा।&#8221;</em></p>



<p>याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता नित्या रामकृष्णन ने दलील दी कि धारा 152 मूल रूप से धारा 124A का ही नया संस्करण है, जिसे सुप्रीम कोर्ट ने पहले ही निलंबित रखा है और जिसकी वैधता पांच जजों की बेंच के पास लंबित है।</p>



<p>लेकिन जस्टिस बागची ने यह दलील खारिज की कि कानून को सिर्फ इस आधार पर असंवैधानिक ठहराया जा सकता है क्योंकि उसका दुरुपयोग हो सकता है। उन्होंने कहा,&nbsp;<em>&#8220;क्या सिर्फ संभावित दुरुपयोग, किसी कानून को असंवैधानिक घोषित करने का वैध आधार है? कानून के कार्यान्वयन और कानून बनाने की शक्ति, दोनों अलग बातें हैं।&#8221;</em></p>



<p>जस्टिस सूर्यकांत ने भी सहमति जताते हुए कहा,&nbsp;<em>&#8220;कोई भी अच्छा कानून, जिसे सुप्रीम कोर्ट ने संवैधानिक माना है, उसका भी पुलिस द्वारा दुरुपयोग किया जा सकता है। 1962 के केदारनाथ सिंह मामले का फैसला अब भी लागू है, जिसमें कहा गया था कि देशद्रोह का अपराध केवल वास्तविक हिंसा या हिंसा के लिए उकसावे तक सीमित है।&#8221;</em></p>



<h3 class="wp-block-heading"><strong>&#8220;नाम बदला, मंशा वही&#8221; – याचिकाकर्ता</strong></h3>



<p>वरिष्ठ अधिवक्ता रामकृष्णन ने कहा कि भले ही धारा 152 में ‘देशद्रोह’ शब्द नहीं है, लेकिन इसकी भावना और मंशा बिल्कुल धारा 124A जैसी है, और इसे पत्रकारों को परेशान करने के लिए लगातार इस्तेमाल किया जा रहा है।</p>



<p>पीठ ने इस याचिका को एस.जी. वोम्बटकेरे की याचिका के साथ टैग करने पर सहमति जताई। वोम्बटकेरे ने भी धारा 152 की वैधता को चुनौती दी है और उनकी पहले की धारा 124A के खिलाफ याचिका सुप्रीम कोर्ट में लंबित है।</p>
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		<title>सुप्रीम कोर्ट में खुली EVM, वोटों की गिनती में हारे हुए प्रत्याशी को मिली जीत, निशाने पर BJP</title>
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		<dc:creator><![CDATA[TIMES OF CRIME]]></dc:creator>
		<pubDate>Thu, 14 Aug 2025 16:57:12 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[राजनीति]]></category>
		<category><![CDATA[राष्ट्रीय]]></category>
		<category><![CDATA[इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन]]></category>
		<category><![CDATA[ईवीएम]]></category>
		<category><![CDATA[पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय]]></category>
		<category><![CDATA[सुप्रीम कोर्ट]]></category>
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					<description><![CDATA[सभी जिले एवं तहसीलों में ब्यूरो संवाददाताओं की आवश्यकता है हमसे जुड़ने के लिए संपर्क करें : 9893221036 भारत में चुनावी विवादों में इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन (EVM) को लेकर हमेशा सवाल उठते रहे हैं। लेकिन अब पहली बार ऐसा हुआ है कि सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर ईवीएम खोली गई और वोटों की गिनती की...]]></description>
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<p><strong>सभी जिले एवं तहसीलों में ब्यूरो संवाददाताओं की आवश्यकता है हमसे जुड़ने के लिए संपर्क करें : 9893221036</strong></p>



<p>भारत में चुनावी विवादों में इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन (EVM) को लेकर हमेशा सवाल उठते रहे हैं। लेकिन अब पहली बार ऐसा हुआ है कि सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर ईवीएम खोली गई और वोटों की गिनती की गई। यह मामला हरियाणा के पानीपत जिले के बुआना लाखु गांव के पंचायत चुनाव से जुड़ा है। यहां सरपंच पद के चुनाव में विवाद हुआ था, जिस पर कोर्ट ने खुद हस्तक्षेप किया और चुनावी रिकॉर्ड सहित ईवीएम की गिनती का आदेश दिया। इस पूरी प्रक्रिया में दोनों पक्ष मौजूद थे और गिनती का वीडियो रिकॉर्डिंग भी की गई। जांच में यह पाया गया कि हारे हुए प्रत्याशी को जीत मिली है। इसे लेकर राजनीतिक हलकों में हलचल मच गई है।</p>



<h3 class="wp-block-heading"><strong>बुआना लाखु गांव का सरपंच चुनाव और विवाद का इतिहास</strong></h3>



<p>बुआना लाखु गांव में 2 नवंबर 2022 को सरपंच पद के लिए चुनाव हुआ था। इस चुनाव में कुलदीप कुमार सिंह को विजयी घोषित किया गया था। परंतु मोहित कुमार ने इस नतीजे को चुनौती दी और अतिरिक्त सिविल न्यायाधीश के समक्ष पुनर्मतगणना की मांग की। न्यायालय ने 22 अप्रैल 2025 को पुनर्मतगणना का आदेश दिया था। हालांकि पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय ने बाद में इस पुनर्मतगणना आदेश को रद्द कर दिया। इसके बाद मोहित कुमार ने मामले को सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचाया। कोर्ट ने अंतिम फैसला सुनाने से पहले चुनाव में इस्तेमाल ईवीएम की गिनती कराने का आदेश दिया, जो पहली बार हुआ।</p>



<h3 class="wp-block-heading"><strong>वोटों की गिनती में हारा हुआ प्रत्याशी हुआ विजेता</strong></h3>



<p>सुप्रीम कोर्ट के निर्देशानुसार ईवीएम की गिनती रजिस्टार की निगरानी में की गई। इस दौरान दोनों पक्षों के प्रतिनिधि मौजूद रहे। पूरी प्रक्रिया का वीडियो रिकॉर्ड किया गया। गिनती के बाद मोहित कुमार को विजयी घोषित किया गया, जबकि पहले कुलदीप कुमार को ही जीतता माना जा रहा था। इस नए नतीजे ने चुनाव प्रक्रिया की पारदर्शिता पर सवाल उठाए हैं और लोगों के मन में ईवीएम की विश्वसनीयता को लेकर बहस शुरू कर दी है।</p>



<h3 class="wp-block-heading"><strong>राजनीतिक प्रतिक्रिया और BJP पर निशाना</strong></h3>



<p>वोटों की इस नई गिनती और परिणाम के बाद राजनीतिक पार्टियों ने इस मुद्दे को लेकर तीखी प्रतिक्रिया दी है। खासकर विपक्षी नेता तेजस्वी यादव ने इस फैसले को लेकर बीजेपी पर निशाना साधा है। उनका कहना है कि यह मामला बीजेपी की चुनावी मनमानी और ईवीएम के दुरुपयोग की ओर इशारा करता है। साथ ही कई अन्य नेता और पार्टियां भी इस फैसले को लेकर सवाल उठा रही हैं कि क्या ईवीएम में छेड़छाड़ हो सकती है और चुनाव प्रक्रिया पूरी तरह निष्पक्ष है या नहीं। यह विवाद देश में चुनाव प्रणाली की पारदर्शिता और भरोसे को लेकर महत्वपूर्ण चर्चा का विषय बन गया है।</p>



<h3 class="wp-block-heading"><strong>क्या है ईवीएम और क्यों है ये विवादित?</strong></h3>



<p>ईवीएम यानि इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन, भारत में चुनाव के दौरान उपयोग की जाने वाली मशीन है, जिससे वोट गिनती इलेक्ट्रॉनिक तरीके से होती है। इसे चुनाव आयोग ने भ्रष्टाचार और धोखाधड़ी रोकने के लिए लागू किया था। हालांकि समय-समय पर ईवीएम को लेकर मतदाता और पार्टियों के बीच विवाद होते रहते हैं कि कहीं मशीन में छेड़छाड़ तो नहीं की गई। यह मामला भी उसी संदर्भ में देखा जा रहा है, जहां सुप्रीम कोर्ट ने पहली बार खुद ईवीएम खोल कर जांच की।</p>
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