व्यंग्य – राजेन्द्र सिंह जादौन
आपने नेताओं को रेड कारपेट पर चलते देखा होगा। वही चमक, वही रुतबा, वही कैमरों की कतार। सत्ता जब चलती है तो ज़मीन नहीं छूती, कारपेट पर तैरती है। इसी राजनीतिक दर्शन से प्रेरणा लेते हुए डॉ. मोहन सरकार ने जनता के लिए भी एक कारपेट पेश किया है ब्लैक कारपेट। फर्क बस इतना है कि यह सम्मान का नहीं, सहनशीलता का प्रतीक है।
पहले जनता सड़क पर चलती थी। सड़क में गड्ढे होते थे, सड़क टूटती थी, और सरकार को जवाब देना पड़ता था। अब पीएचडी मुख्यमंत्री ने इस पुरानी समस्या का आधुनिक समाधान खोज लिया है। सड़क ही हटा दो। उसकी जगह काला कारपेट बिछा दो। न सड़क बचेगी, न गड्ढे गिने जाएंगे। यह प्रशासनिक नवाचार है जिसे चाहें विकास कह लें, या मजबूरी का मेकअप।
यह ब्लैक कारपेट खास तौर पर जनता को ध्यान में रखकर बनाया गया है। हल्का है, उखड़ने में तेज़ है, और सबसे बड़ी बात इसे कहीं भी उठा कर ले जाया जा सकता है। गली में नहीं जंचा तो खेत में बिछा लो। खेत में नहीं चला तो मोहल्ले में डाल दो। सड़क नुमा कारपेट का यही तो कमाल है जहाँ बिछाओ, वहीं सड़क का भ्रम पैदा कर देता है।
मोहन सरकार के दो साल पूरे हो चुके हैं। सरकार कहती है इतना कुछ दिया, फिर भी जनता खुश नहीं। जनता सोचती है शायद खुश होने वाली सड़क अभी अगली परत में आएगी। स्कूल, अस्पताल, रोजगार जैसे मुद्दे पुराने हो चुके हैं। अब जनता को “अनुभव” दिया जा रहा है फिसलने का अनुभव, उखड़ने का अनुभव, और हर दिन संभलकर चलने का अनुभव ब्लैक कारपेट का रंग भी सोच-समझकर चुना गया है। काला रंग हर दाग छुपा लेता है। गुणवत्ता उखड़े तो दिखता नहीं, जवाबदेही फिसले तो नज़र नहीं आती। बारिश में यह कारपेट बहता है, गर्मी में पिघलता है, और ट्रैफिक में बिखर जाता है। लेकिन हर हाल में निर्दोष रहता है, क्योंकि यह सड़क नहीं है कारपेट है
नेताओं के लिए रेड कारपेट बिछता है, ताकि वे ऊँचे दिखें। जनता के लिए ब्लैक कारपेट बिछता है, ताकि वह चुपचाप सहती रहे। रेड कारपेट पर चलकर तस्वीरें बनती हैं, ब्लैक कारपेट पर चलकर कहानियाँ बनती हैं दुर्घटनाओं की, शिकायतों की, और रोज़मर्रा की जद्दोजहद की।
पहले सड़क सवाल पूछती थी मरम्मत क्यों नहीं हुई? अब कारपेट जवाब देता है मैं अस्थायी हूँ। यही इस व्यवस्था की सबसे बड़ी सुविधा है। स्थायित्व से मुक्ति, जिम्मेदारी से आज़ादी।
अंत में इतना ही कि यह ब्लैक कारपेट एक गिफ्ट है जनता की सहनशक्ति के नाम। नेताओं के पैरों के नीचे रेड कारपेट, जनता के पैरों के नीचे ब्लैक कारपेट। यही है मोहन सरकार का विकास मॉडल सड़क नहीं, सड़कनुमा कारपेट; समाधान नहीं, सजावट; और जवाब नहीं, बस एक और परत।