Headlines

इंदौर में ‘जहर’ बना पानी! 9 मौतें, सवालों के घेरे में सत्ता

इंदौर में 'जहर' बना पानी! 9 मौतें, सवालों के घेरे में सत्ता

जिले एवं तहसीलों में ब्यूरो संवाददाताओं की आवश्यकता है हमसे जुड़ने के लिए संपर्क करें : 9893221036

इंदौर. देश का सबसे स्वच्छ, सबसे स्मार्ट और सबसे सक्षम शहर कहलाने वाला इंदौर आज दूषित पानी से हुई मौतों और सैकड़ों बीमार नागरिकों की कराह से शर्मसार है। करीब 1200 से 1300 लोगों का अस्पतालों में भर्ती होना और कई निर्दोष नागरिकों की जान जाना, किसी प्राकृतिक आपदा का परिणाम नहीं, बल्कि सरकारी लापरवाही, प्रशासनिक निकम्मेपन और सत्ता की असंवेदनशीलता का नतीजा है।

विडंबना यह है कि यह भयावह घटना उस क्षेत्र में घटी है जो प्रदेश के कैबिनेट मंत्री कैलाश विजयवर्गीय का गृह क्षेत्र है। यदि एक प्रभावशाली मंत्री के क्षेत्र में नागरिकों को शुद्ध पेयजल तक नहीं मिल पा रहा, तो यह सीधे-सीधे सरकार की प्राथमिकताओं पर सवाल खड़े करता है। क्या विकास केवल पोस्टरों और विज्ञापनों तक सीमित है? क्या आम जनता की जान की कोई कीमत नहीं?

पानी जीवन है—यह कोई नारा नहीं, बल्कि बुनियादी सच्चाई है। फिर भी इंदौर में वही पानी मौत का कारण बन गया। नगर निगम, जल प्रदाय विभाग और स्वास्थ्य विभाग—तीनों की भूमिका संदेह के घेरे में है। क्या जल की नियमित जांच नहीं होती? क्या दूषित पानी की जानकारी समय रहते नहीं मिली? और यदि मिली, तो उसे छिपाया क्यों गया?

सरकार और प्रशासन की प्रतिक्रिया भी उतनी ही चिंताजनक रही है जितनी घटना स्वयं। न तत्काल चेतावनी, न वैकल्पिक जल व्यवस्था, न ही जिम्मेदारी तय करने की तत्परता। मौतों के बाद औपचारिक बयान, खानापूर्ति जांच और आश्वासनों की राजनीति—क्या यही सुशासन है?

स्वच्छता पुरस्कारों और स्मार्ट सिटी टैग के पीछे छिपा यह कड़वा सच अब सामने आ चुका है। चमकते शहर के भीतर बुनियादी व्यवस्थाएं खोखली हैं। यह घटना उन तमाम दावों को बेनकाब करती है, जिनके सहारे सरकारें अपनी पीठ थपथपाती रही हैं।

सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि अब तक किसी ने नैतिक जिम्मेदारी क्यों नहीं ली? क्या किसी अधिकारी ने इस्तीफा दिया? क्या किसी मंत्री ने सार्वजनिक रूप से जवाबदेही स्वीकार की? या फिर यह मान लिया गया है कि जनता सब कुछ सह लेगी?

यह केवल इंदौर का मामला नहीं, यह पूरे प्रदेश की चेतावनी है। यदि आज दोषियों पर कठोर कार्रवाई नहीं हुई, यदि जल आपूर्ति प्रणाली की संपूर्ण समीक्षा नहीं की गई, और यदि जवाबदेही तय नहीं हुई—तो कल किसी और शहर में यही त्रासदी दोहराई जाएगी।

जनता को अब संवेदनाहीन बयान नहीं, ठोस कार्रवाई चाहिए। उसे जानना है कि मौतों का जिम्मेदार कौन है, दोषियों को सजा कब मिलेगी, और भविष्य में ऐसी घटनाएं रोकने के लिए सरकार क्या ठोस कदम उठाएगी।

इंदौर की यह घटना सत्ता के अहंकार और प्रशासनिक विफलता का आईना है। यदि सरकार सच में जनता के प्रति जवाबदेह है, तो उसे अब शब्दों से नहीं, कार्यवाही से प्रमाण देना होगा—क्योंकि इतिहास गवाह है, जब जनता का सब्र टूटता है, तो सत्ता का सिंहासन भी डगमगाता है।

दूषित पानी ने ले ली 5 माह के मासूम अव्यान की जान……

देश के सबसे स्वच्छ शहर कहलाने वाले इंदौर से एक ऐसी तस्वीर सामने आई है, जिसने इस दावे को गहरे सवालों के घेरे में खड़ा कर दिया है। भागीरथपुरा इलाके में दूषित पीने के पानी ने 5 महीने के मासूम अव्यान की जान ले ली। जिस पानी को उसकी मां ने दूध को हल्का करने के लिए इस्तेमाल किया था, वही पानी बच्चे के लिए जानलेवा साबित हुआ।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *