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RTI का उल्लंघन : न्यायिक और अर्ध न्यायिक निर्णयों के आलोक में सूचना के अधिकार के विधिक पहलू, अब IPC नहीं, भारतीय न्याय संहिता (BNS) की मदद ले

RTI का उल्लंघन : न्यायिक और अर्ध न्यायिक निर्णयों के आलोक में सूचना के अधिकार के विधिक पहलू, अब IPC नहीं, भारतीय न्याय संहिता (BNS) की मदद ले

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इसके बावजूद आज भी लोक सूचना अधिकारी सूचना को रोकना, टालना या भ्रामक उत्तर देना अपना विशेषाधिकार समझ बैठे हैं।

परंतु न्यायपालिका का रुख इस विषय में लगातार और स्पष्ट रहा है—

जहाँ सूचना रोकी जाती है, वहाँ कानून आवेदक के साथ खड़ा होता है।

नागरिक का जानने का अधिकार सर्वोपरि है।

सर्वोच्च न्यायालय ने बार-बार यह दोहराया है कि RTI किसी विभागीय कृपा का विषय नहीं है।

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State of U.P. v. Raj Narain (1975) मामले में

SC ने ऐतिहासिक रूप से कहा —

“लोकतंत्र में जनता को यह जानने का अधिकार है कि सरकार क्या कर रही है।”

यह निर्णय आज भी RTI कानून की रीढ़ माना जाता है और पूर्णतः नागरिक-पक्षीय है।

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S.P. Gupta v. Union of India (1981) केस में

न्यायालय ने स्पष्ट किया कि खुली शासन व्यवस्था (open government) लोकतंत्र का मूल तत्व है और

गोपनीयता अपवाद है,

नियम नहीं।

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Manohar Lal Sharma v. Union of India मामले में RTI से जुड़े अवलोकन कर

SC ने कहा कि सूचना से इनकार तभी संभव है,

जब वह कानूनन अपवाद में स्पष्ट रूप से आती हो।

अन्यथा सूचना देना बाध्यकारी है।

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बिना उचित आधार के सूचना न देना नागरिक के मौलिक अधिकार का उल्लंघन : केंद्रीय सूचना आयोग (CIC) का आवेदक को केंद्र में रख कर दिया गया निर्णय।

CIC के अधिकांश निर्णायक आदेश यह स्थापित करते हैं कि —

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Bhagat Singh v. CIC & Ors. (CIC में उद्धृत, बाद में HC द्वारा अनुमोदित सिद्धांत)

“सूचना रोकने का तर्कसंगत आधार बताने का भार लोक सूचना अधिकारी/ लोक प्राधिकार पर है,

न कि सूचना माँगने वाले नागरिक पर।”

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CIC के निरंतर निर्णय (2023–2025) –

“रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं” कहना तब तक स्वीकार्य नहीं,

जब तक रिकॉर्ड के नष्ट होने/अस्तित्वहीन होने का विधिवत प्रमाण न हो।

अधूरी या भ्रामक सूचना देना, सूचना न देने के समान है

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CIC का स्थापित सिद्धांत

यदि मामला प्रथम व द्वितीय अपील तक पहुँचा—

• यह स्वयं में PIO की विफलता का प्रमाण है

और दंडात्मक कार्रवाई का आधार बनता है।

• CIC का झुकाव स्पष्ट रूप से आवेदक-पक्षीय है,

न कि प्रशासन-संरक्षक।

• High Court : RTI नागरिक का औज़ार है, अधिकारी की ढाल नहीं।

उच्च न्यायालयों ने स्पष्ट शब्दों में कहा है कि RTI अधिनियम को कमजोर करने की कोई भी कोशिश अस्वीकार्य है।

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Delhi High Court – J.P. Agrawal v. Union of India (2011) मामले में दिल्ली हाईकोर्ट ने कहा —

देने योग्य उपलब्ध सूचना देने के लिए PIO व्यक्तिगत रूप से उत्तरदायी है।

यह तर्क स्वीकार्य नहीं कि “विभाग ने सूचना नहीं दी।”

यह निर्णय स्पष्ट रूप से RTI आवेदक के अधिकारों की रक्षा करता है।

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Bombay High Court : मुंबई हाईकोर्ट ने माना कि

RTI अधिनियम का पालन न करना गंभीर कदाचरण

(serious misconduct) है

और नागरिक को न्याय पाने का अधिकार है।

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Rajasthan High Court के निर्णयों का स्थापित रुझान –

यदि प्रथम अपीलीय अधिकारी लोक सूचना अधिकारी की गलती को ढंकने का प्रयास करता है,

तो वह भी समान रूप से दोषी माना जाएगा।

आवेदक के अधिकार को आपराधिक कानून कानून के अंतर्गत संरक्षण ;

RTI उल्लंघन अब केवल जुर्माने का विषय नहीं रहा।

BNS लागू होने के बाद आवेदक का कानूनी संरक्षण और मजबूत हुआ है।

IPC 166 → BNS धारा 198 लागू होती है

लोक सेवक/लोक सूचना अधिकारी द्वारा जानबूझ कर कर्तव्य उल्लंघन कर

आवेदक को मानसिक/आर्थिक क्षति पहुँचाने पर।

IPC 166A → BNS धारा 199 लागू होती है

कानूनन आवश्यक कार्य (RTI सूचना देना) को नहीं करने पर।

IPC 175 → BNS धारा 221 लागू होगी

सूचना/दस्तावेज जानबूझ कर न देने पर।

IPC 188 → BNS धारा 223 लागू होती है प्रथम अपीलीय अधिकारी या केंद्रीय सूचना आयोग या राज्य सूचना आयोग

(FAA / CIC / SIC) के आदेशों की अवहेलना करने पर।

सुप्रीम कोर्ट हाई कोर्ट और केंद्रीय सूचना आयोग (CIC, High Court, Supreme Court) — तीनों का संयुक्त संदेश स्पष्ट है :

  1. RTI आवेदक याचक नहीं, अधिकार-धारक है।
  2. सूचना रोकना अब प्रशासनिक गलती नहीं,
  3. बल्कि संवैधानिक और आपराधिक उल्लंघन है।

* Legal Ambit का स्पष्ट मत है कि अब अपीलों में उलझाने की संस्कृति समाप्त होनी चाहिए और

जहाँ आवश्यक हो, आवेदकों को सीधी विधिक कार्यवाही करना चाहिए।

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– भाई विनोद कुमार की पोस्ट

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